भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली वर्तमान में 'रोगाणुरोधी प्रतिरोध' (Antimicrobial Resistance - AMR) यानी 'सुपरबग्स' के एक भयंकर संकट का सामना कर रही है। वर्षों से सर्दी-जुकाम या बदन दर्द जैसी छोटी-मोटी बीमारियों के लिए मेडिकल स्टोर (केमिस्ट) से बिना डॉक्टर के पर्चे (Over-The-Counter) के शक्तिशाली एंटीबायोटिक्स और नींद की गोलियां खरीदने की जो प्रथा देश में पनपी, उसने आज एक विनाशकारी रूप ले लिया है। इस अनियंत्रित बिक्री के कारण तपेदिक (MDR-TB) जैसी बीमारियों के बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो गए हैं और नशीली दवाओं की लत समाज में गहराई तक पैठ बना चुकी है।
📌 मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- शेड्यूल H-I क्या है? यह 46 विशिष्ट, उच्च-जोखिम वाली दवाओं (जैसे हाई-एंड एंटीबायोटिक्स, नींद की गोलियां, और टीबी की दवाएं) की एक सूची है, जिन्हें बिना रजिस्टर्ड डॉक्टर के पर्चे के बेचना सख्त अपराध है।
- 9-कॉलम का अनिवार्य रजिस्टर: बिहार में इन 46 दवाओं की बिक्री के लिए सभी खुदरा औषधि विक्रेताओं को एक अलग "PRESCRIPTION REGISTER" बनाना अनिवार्य है, जिसमें मरीज और डॉक्टर के विवरण के साथ-साथ दवा का बैच नंबर दर्ज करना होगा।
- 3-वर्षीय अवधारण नियम: इस रजिस्टर को निरीक्षण के लिए कम से कम तीन (3) वर्षों तक सुरक्षित रखना अनिवार्य है।
- ब्रांड प्रतिस्थापन पर रोक (No Substitution): फार्मासिस्ट अपनी मर्जी से डॉक्टर द्वारा लिखे गए दवा के 'ब्रांड' को नहीं बदल सकता।
- सजा और जुर्माना: नियमों का उल्लंघन करने पर फार्मेसी का ड्रग लाइसेंस तत्काल रद्द किया जा सकता है और औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत 3 से 5 साल तक की जेल हो सकती है।
1. ऐतिहासिक संदर्भ: शेड्यूल H-1 की आवश्यकता क्यों पड़ी?
'औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम, 1945' के तहत दवाओं को उनके जोखिम के आधार पर विभिन्न अनुसूचियों (Schedules) में बांटा गया है। पहले मुख्य रूप से 'शेड्यूल H' और 'शेड्यूल X' होते थे। लेकिन समय के साथ 'शेड्यूल H' में 510 से अधिक दवाएं शामिल हो गईं, जिससे हर दवा के लिए नियम का पालन करना प्रशासनिक रूप से मुश्किल हो गया।
नतीजतन, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बिना डॉक्टर के पर्चे के शक्तिशाली एंटीबायोटिक्स (जैसे Ceftriaxone, Meropenem) और नींद/चिंता की गोलियों (जैसे Alprazolam, Diazepam) की धड़ल्ले से बिक्री होने लगी। इसी 'मौन महामारी' को रोकने के लिए भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने राजपत्र अधिसूचना जी.एस.आर. 588(ई) (30 अगस्त 2013) जारी की और 1 मार्च 2014 से एक नई श्रेणी 'अनुसूची एच-१' (Schedule H1) लागू कर दी।
इस नियम के तहत दवा के डिब्बे (पैकेजिंग) पर लाल रंग का 'Rx' निशान और एक लाल रंग के बॉक्स में सख्त चेतावनी छपी होना अनिवार्य कर दिया गया।
2. बिहार सरकार का कड़ा निर्देश: हेमंत कुमार सिन्हा का आधिकारिक आदेश
बिहार में इस केंद्रीय कानून को धरातल पर अत्यंत सख्ती से लागू करने के लिए तत्कालीन 'राज्य औषधि नियंत्रक' (State Drug Controller), श्री हेमंत कुमार सिन्हा ने एक आधिकारिक आदेश (पत्रांक: सू.ज.स.वि.-788 (स्वा.) 14-15) जारी किया।
इस आदेश ने स्पष्ट कर दिया कि शेड्यूल H-I में उल्लिखित 46 प्रकार की औषधियों, उनके साल्ट्स (Salts) और फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (Fixed dose combinations) की बिक्री के लिए एक अलग PRESCRIPTION REGISTER संधारित करना "अनिवार्य" है।
📊 बिहार सरकार द्वारा मानकीकृत 9-कॉलम का रजिस्टर प्रारूप (Format)
आदेश के अनुसार, बिक्री के तुरंत बाद विक्रेता को इस 9-कॉलम वाले रजिस्टर में प्रविष्टि करनी होगी:
| क्र० सं० | बिक्री तिथि | चिकित्सक का नाम | रोगी का नाम व पता | औषधि व बैच सं० | निर्माता का विवरण | अवसान तिथि (Expiry) | कैशमेमो सं० व दिनांक | फार्मासिस्ट हस्ताक्षर |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| (इस प्रारूप में रजिस्टर संधारित करना अनिवार्य है) | ||||||||
नोट: बैच नंबर और एक्सपायरी डेट दर्ज करने से यदि भविष्य में कोई दवा 'घटिया मानक' (NSQ) की पाई जाती है, तो स्वास्थ्य विभाग सीधे उन मरीजों को ट्रैक कर सकता है जिन्होंने वह दवा खाई है।
3. दवा बिक्री के 5 सख्त नियम (The 5 Golden Rules for Dispensing)
बिहार सरकार के आधिकारिक सूचना पत्र में दवा विक्रेताओं के लिए 5 बेहद सख्त निर्देश दिए गए हैं, जिनका उल्लंघन सीधे लाइसेंस रद्द करवा सकता है:
- कैशमेमो के बाद ही रजिस्टर में प्रविष्टि: शेड्यूल H-I की दवा रजिस्टर्ड डॉक्टर के पर्चे पर बेचने के बाद, पहले नकद रसीद (Cash Memo) काटी जाएगी और फिर संबंधित सूचना को रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा।
- एक पर्चे पर सिर्फ एक बार दवा (No Repeat Prescription): कोई भी मरीज पुरानी पर्ची दिखाकर दोबारा वही दवा नहीं खरीद सकता। जब तक डॉक्टर ने खुद पर्ची पर लिखकर यह निर्देश न दिया हो कि दवा को कितनी बार 'रिपीट' (Repeat) करना है, तब तक फार्मासिस्ट उसे दोबारा नहीं बेच सकता। यह नियम मरीजों को नशे की लत (Addiction) और ओवरडोज से बचाता है।
- मात्रा और अंतराल का पालन: पर्ची पर लिखी गई दवा की सटीक मात्रा और खुराक के अंतराल के अनुसार ही दवा दी जाएगी।
- ब्रांड नहीं बदल सकते (No Brand Substitution): यह सबसे अहम नियम है। फार्मासिस्ट अपनी मर्जी से किसी अन्य जेनेरिक या ब्रांड की दवा मरीज को नहीं दे सकता। यदि प्रतिस्थापन (Substitution) जरूरी है, तो इसके लिए डॉक्टर का लिखित निर्देश होना अनिवार्य है। संकीर्ण 'थेराप्यूटिक इंडेक्स' वाली दवाओं में ब्रांड बदलने से मरीज की जान को खतरा हो सकता है।
- पर्चे को 'डिफेस' (Deface) करना: दवा बेचने के बाद, फार्मासिस्ट को मरीज की पर्ची पर अपनी मुहर (Stamp) लगानी होगी और बिक्री की तारीख अंकित करनी होगी, ताकि उसी पर्ची का इस्तेमाल करके मरीज किसी दूसरी दुकान से दवा न खरीद सके।
4. अनुसूची एच-१ (Schedule H1) की 46 औषधियों की सम्पूर्ण सूची
इस सूची में शामिल दवाओं को मुख्यतः तीन श्रेणियों में रखा गया है: तीसरी/चौथी पीढ़ी के एंटीबायोटिक्स, एंटी-टीबी दवाएं, और नींद/दर्द की शक्तिशाली दवाएं।
ये रही उन 46 दवाओं की पूरी सूची (इनके सभी ब्रांड्स और कॉम्बिनेशंस पर यह नियम लागू है):
(नोट: कान/आँख/नाक के ड्रॉप्स पर भी नियम लागू। क्रीम और मलहम इस सूची से बाहर हैं)
5. विधिक उल्लंघन: सजा और दंडात्मक प्रावधान (Legal Consequences)
बिहार राज्य औषधि नियंत्रक का यह आदेश कोई सामान्य 'एडवाइजरी' नहीं है। यदि कोई भी केमिस्ट बिना पर्चे के इन दवाओं को बेचता है या '3 साल' तक रजिस्टर सुरक्षित नहीं रखता है, तो उस पर 'औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940' के अध्याय IV के तहत सख्त आपराधिक मुकदमा दर्ज होता है:
- लाइसेंस रद्दीकरण: ड्रग इंस्पेक्टर बिना पूर्व सूचना के औचक निरीक्षण (Surprise inspection) कर सकते हैं। अनियमितता पाए जाने पर फार्मेसी का 'ड्रग लाइसेंस' तुरंत निलंबित (Suspend) या स्थायी रूप से रद्द (Cancel) कर दिया जाता है।
- आपराधिक अभियोजन (धारा 27-b): बिना वैध प्रविष्टि के इन दवाओं की बिक्री पर कम से कम 3 वर्ष का कारावास (जिसे 5 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है) और न्यूनतम 1 लाख रुपये का जुर्माना है।
- कॉर्पोरेट जिम्मेदारी: बड़ी ई-फार्मेसी (E-pharmacy) या फार्मेसी चेन के मामले में कंपनी के निदेशकों (Directors) और मैनेजर्स को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी माना जाता है।
📝 निष्कर्ष: 'व्यापारी' से 'स्वास्थ्य रक्षक' तक का सफर
शेड्यूल H-1 कानून ने फार्मेसी व्यवसाय की पूरी परिभाषा बदल दी है। अब एक फार्मासिस्ट केवल दवा बेचने वाला 'व्यापारी' नहीं रहा, बल्कि वह जनस्वास्थ्य की रक्षा करने वाला एक अहम 'निर्णयकर्ता' और 'देखभालकर्ता' बन गया है।
बिहार सरकार द्वारा जारी किए गए पत्र का वह अंतिम वाक्य, "सरकारी सेवा जनसेवा का माध्यम है, धर्म ईमान की तरह इसे भी बेदाग रखें," यह स्पष्ट करता है कि स्वास्थ्य सेवा से जुड़ा कोई भी काम सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं हो सकता।
चाहे वह कोई डॉक्टर हो जो पर्चा लिख रहा हो, वह फार्मासिस्ट हो जो दवा बाँट रहा हो, या वह मरीज हो जो तुरंत आराम के लिए बिना पर्चे की दवा माँग रहा हो—हम सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। एंटीबायोटिक्स की ताकत को बचाए रखना और समाज को नशामुक्ति से दूर रखना हम सबकी सामूहिक नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है।